आचार्य विद्यासागर गुरु की आरती
गुण-रत्नाकर विद्यासागर यह मंगल – दीपक हाथ लिये, आरती उतारूँ गुरुवर की
जन्म-पूर्व सपने में माँ को चारण-मुनि दिखलाए, हो! चारण-मुनि दिखलाए
पूर्णकाम बनने को स्वामी! पूनम की दिन आए । ओ स्वामी! पूनम के दिन आए
शिवपथगामी अन्तर्यामी यह मंगल – दीपक हाथ लिये, आरती उतारूं गुरुवर की…..१
तरुण-अवस्था में पहचाना, क्या मेरा, क्या तेरा ? हो ! क्या मेरा, क्या तेरा
समता का जीवन अपनाया तज ममता का डेरा ओ स्वामी! तज ममता का डेरा
समताधारी ममताहारी यह मंगल – दीपक हाथ लिये, आरती उतारूं गुरुवर की …. २
वस्त्राभूषण छोड़ चुके पर संयम भूषण – धारी, हो ! संयम-भूषण-धारी
नीरस भोजन लेते तो भी बोल सरस सुखकारी । ओ स्वामी! बोल सरस सुखकारी
रस के त्यागी मन वैरागी यह मंगल – दीपक हाथ लिये, आरती उतारूं गुरुवर की …..३
इष्ट-वार गुरुवार आपका गुरुवर ! कितना प्यारा, हो ! गुरुवर ! कितना प्यारा
गुरु-उपकार चुकाने गुरु के गुरु-पद को स्वीकारा। ओ स्वामी! गुरु-पद को स्वीकारा
गुरुओं में गुरु विद्यासागर यह मंगल- दीपक हाथ लिये, आरती ऊतारूँ गुरुवर की …..४
कलियुग में सतयुग सी गुरु की शिष्य – मंडली प्यारी । हो! शिष्य-मंडली प्यारी
निर्मोही गुरुवर पर देखो मोहित जनता सारी, हो! ओ स्वामी! मोहित जनता सारी
छवि अविकारी लगती न्यारी यह मंगल – दीपक हाथ लिये, आरती उतारूं गुरुवर की …. ५
गुण-रत्नाकर विद्यासागर यह मंगल दीपक हाथ लिये, आरती उतारूँ गुरुवर की
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